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भक्तों की मनोकामना पूरी करती है मां मैनपुर कोटेश्वरी

भक्तों की मनोकामना पूरी करती है मां मैनपुर कोटेश्वरी

मल्लूडीह कुशीनगर मंकेश कुमार राय — शारदीय नवरात्रि देवी पूूजा को समर्पित एक हिन्दू त्योहार है, जो शरद ऋतु में मनाया जाता है। हिन्दू परम्परा में नवरात्रि का त्योहार, वर्ष में दो बार प्रमुख रूप से मनाया जाता है । आश्विन मास में शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवरात्रि मनाया जाता है। शारदीय नवरात्रि के उपरान्त दशमी तिथि को विजयदशमी (दशहरा) पर्व मनाया जाता है। शारदीय नवरात्रि का महात्म्य सर्वोपरि इसलिये है कि इसी समय देवताओं ने दैत्यों से परास्त होकर आद्या शक्ति की प्रार्थना की थी और उनकी पुकार सुनकर देवी माँ का प्राकट्य हुआ। उनके पश्चात मां भगवती ने दैत्यों का वध किया था।उस समय देवी माँ की स्तुति देवताओं ने की थी। उसी पावन स्मृति में शारदीय नवरात्रि का महोत्सव मनाया जाता है।
कुशीनगर जिले के अन्तर्गत विकास खण्ड कसया के मैनपुर ग्राम पंचायत में स्थित तीनों ओर से कंदराओं से घिरा मां मैनपुर कोटेश्वरी देवी सदैव से ही आस्था और अध्यात्म का केंद्र रहा है। शारदीय नवरात्रि की शुरुआत आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है। शारदीय नवरात्रि में भक्त कलश स्थापना के बाद नौ दिनों तक मां भगवती के नौ स्वरूपों की विधि विधान से पूजा अर्चना करते हैं। वैसे तो इस मंदिर मे बारहों महीने भक्त पूजा अर्चना करने के लिए आते रहते हैं, लेकिन नवरात्रि की शुरुआत होते ही मां कोटेश्वरी देवी का मंदिर यहां आये भक्तों से जगमगाने लगता है। हजारों की संख्या में भक्तों की भीड़ माता का आशीर्वाद लेने और माथा टेकने मंदिर पहुंचती है। मैनपुर कोट स्थित शक्तिपीठ के अतीत की कहानी काफी गौरवशाली और आध्यात्मिक है। इसका वर्णन दीपवंश धर्म ग्रंथ में मिलता है। यहां पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान रुककर देवी की आराधना की थी। ऐतिहासिक कुशीनारा (वर्तमान कुशीनगर) का वर्णन बौद्ध धर्मग्रंथ दीपवंश में भी मिलता है। वर्णन के मुताबिक कुशीनगर मल्लो की राजधानी थी। मल्लो ने मैनपुर को अपनी छावनी बनाया था। इसमें भगवान बद्ध के निर्वाण स्थली
के उल्लेख के साथ ही मैनपुर को मल्लो की छावनी के रूप में वर्णित किया गया है। मल्लो की उद्धारक देवी थीं मां मैनपुर कोटेश्वरी देवी, दीपवंश ग्रंथ यह बताता है कि मैनपुर कोट की देवी मल्लो की उद्धारक देवी थीं। कोई भी आपदा हो या युद्ध में जाने का समय, पहले माता का पूजन-अर्चन होता था। इसके बाद ही निदान या युद्ध घोष किया जाता था। माता के कृपा से ही मल्लो को अपने राज्य के लोगों का उद्धार होने का विश्वास था।
जनश्रुतियों के मुताबिक मैनपुर कोट का संबंध महाभारत काल से भी है। ऐसा कहा जाता है कि अज्ञातवास के समय पाण्डव यहां भी कुछ समय बिताए थे। उस समय यह क्षेत्र देवारण्य के रूप में विख्यात था।बंजारों की कुल देवी थीं भगवती मां कोटेश्वरी, बेतों के घने जंगल से घिरे इस क्षेत्र में आसपास बंजारों की आबादी थी। वे मैनपुर की भगवती को अपना कुल देवी मनते थे। बंजारे यहां पूजन-अर्चन करते और
माता का आशीष लेते थे। बीसवीं शताब्दी तक यहां बंजारों का निवास था। बंजारे इस देवी को कुलदेवी के रूप में पूजते रहे। आज भी आसपास मौजूद बेंत इसकी गवाही देते हैं।बारहों महीने श्रद्धवालुओं का मंदिर पहुंचकर पूजन अर्चन करने का सिलसिला चलता रहता है। कोटेश्वरी देवी सबकी मुरादें पूर्ण करती हैं। मंदिर के आसपास मौजूद बेंत इसकी गवाही देते हैं। मैनपुर कोट योग साधना के लिए प्रसिद्ध रहा है। अनेकों ऋषि-मुनियों ने यहां पहुंचकर योग साधना की है। इनमें से एक जीवन दास बाबा थे। उनके बारे में कहा जाता है कि जीवन दास बाबा योग के माध्यम से अपने पेट के अंदर के अंगों को बाहर निकालकर उनकी सफाई करने के बाद पुन- पेट के भीतर करने की कला में महारथ हासिल की थी। पुजारी मौनी बाबा ने बताया कि यहां पर साल भर श्रद्धालु् आकर माता कोटेश्वरी देवी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। शारदीय नवरात्र और चैत्र नवरात्र में पूजन अर्चन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मैनपुर कोट मंदिर पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा के बारे में कसया थाना प्रभारी गिरजेश उपाध्याय ने बताया कि मन्दिर परिक्षेत्र में लगे
सीसीटीवी कैमरे का भी निरीक्षण किया गया है। जो कैमरे खराब थे उन्हें ठीक कराया जा रहा है। मंदिर में आने वाले लोगों को सुरक्षा प्रदान करना हमारा कर्तव्य है। सुरक्षा व्यवस्था में उपनिरीक्षक, पुरुष कान्स्टेबल के साथ महिला कान्स्टेबल को भी लगाया गया है।

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Author: SPP BHARAT NEWS

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