???? आरती का आध्यात्मिक विज्ञान ????

जगत के प्रत्येक तत्त्व में ईश्वर की दिव्यता समायी हुई है। यह पाँच तत्त्व—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—जगत के हर रूप में विद्यमान हैं। इन्हीं पाँच तत्त्वों का प्रतीकात्मक रूप से संयोजन आरती के माध्यम से होता है। यही वह आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जो हमें आत्मा के परमस्वरूप से मिलाती है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, आरती केवल एक भौतिक क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा के शुद्धिकरण और ईश्वर के साथ एकात्मता की प्रक्रिया है। यह तत्त्वों की शुद्ध ऊर्जा को जगाकर हमें ईश्वर के निकट ले जाती है।
तत्त्वों के माध्यम से आरती का मार्ग
जगत की सृष्टि का क्रम आत्मा से प्रारंभ होकर आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तक पहुंचता है। यही क्रम ईश्वर की आराधना में भी देखा जाता है।
1. आत्मा से प्रारंभ: जब हम आरती का आरंभ करते हैं, तो पहले हमें अपने आत्मस्वरूप को पहचानना होता है। इसके पश्चात हम आकाश के शब्द गुण, अर्थात् शंख का उपयोग करते हैं, जिससे हम ब्रह्मा के प्रतीक स्वरूप को प्रणाम करते हैं।
2. वायु का प्रतीक: फिर वायु तत्त्व के प्रतीक रूप में चंवर या वस्त्र का उपयोग किया जाता है। यह हवा की शीतलता और शुद्धता को दर्शाता है, जो हमारी आत्मा की शुद्धि का प्रतीक है।
3. अग्नि का प्रकाश: अग्नि तत्त्व की आराधना हम धूप और दीपक से करते हैं, जो आत्मा के भीतर के अंधकार को दूर करने का कार्य करता है।
4. जल का महत्व: जल तत्त्व का प्रदर्शन कुंभारती और जलयुक्त शंख से किया जाता है। जल, जो जीवन का स्रोत है, हमें शुद्धता और पुनर्नवा की ओर प्रवृत्त करता है।
5. पृथ्वी का आभार: अंत में, पृथ्वी तत्त्व का सम्मान अंगुली के मुद्राओं या हाथ जोड़ने की क्रिया द्वारा किया जाता है, जो हमारे शरीर के प्रति सम्मान और उसका सही उपयोग करने की प्रेरणा देता है।
आरती का घुमाने का विधि
आरती की प्रक्रिया में कितनी बार दीपक घुमाना चाहिए, यह शास्त्रों में विशद रूप से बताया गया है। प्रत्येक देवता की आरती उनके बीजमंत्र और तिथि के अनुरूप होती है।
– “विष्णु” की आरती में बारह आवर्तन होते हैं, क्योंकि वे द्वादशात्मा हैं और उनके मंत्र में भी बारह अक्षर होते हैं।
– “सूर्य” की आरती में सात बार घुमाना आवश्यक होता है, क्योंकि वे सात रश्मियों के अधिष्ठाता हैं।
– “दुर्गा” की आरती में नौ बार घुमाना चाहिए, क्योंकि उनके मंत्र में नौ अक्षर होते हैं।
– “गणेश” की आरती में चार बार घुमाना होता है, क्योंकि वे चतुर्थी तिथि के अधिष्ठाता हैं।
शास्त्र में इन आवर्तनों की संख्या का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। यह संख्या उस देवता की ऊर्जा और उसकी दिव्यता के अनुरूप है, जो हम आरती के माध्यम से अनुभव करते हैं।
आरती का आध्यात्मिक उद्देश्य
आरती का वास्तविक उद्देश्य केवल एक रचनात्मक क्रिया करना नहीं है, बल्कि यह हमारी आत्मा को शुद्ध करना, ईश्वर के साथ एकात्मता का अनुभव करना और भीतर की परम शांति को प्राप्त करना है। प्रत्येक तत्त्व का आह्वान हमें जीवन की शुद्धता और दिव्यता की ओर मार्गदर्शित करता है। आरती के प्रत्येक आवर्तन में हम अपने भीतर के अंधकार को समाप्त करते हैं और शुद्धतम प्रकाश की ओर अग्रसर होते हैं।
इस प्रकार, आरती केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जो हमें आत्मा की शुद्धि, ईश्वर के साथ मिलन और जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर ले जाती है।
Author: SPP BHARAT NEWS






