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कलम : सत्य, करुणा और सर्वहारा की अटूट आवाज़

कलम : सत्य, करुणा और सर्वहारा की अटूट आवाज़

कलम, मात्र स्याही और कागज़ का संयोग नहीं, बल्कि एक जीवंत शक्ति है। यह विचार, भावना और सत्य का वहन करती है, और जब इसमें निष्ठा का वास होता है, तो यह हर उस मज़लूम के साथ खड़ी होती है जिसे समाज के हाशिये पर धकेल दिया जाता है। सत्ता के गलियारों में बैठे नीति निर्धारकों, क्या आपने कभी इस मौन क्रांति की शक्ति को महसूस किया है? क्या आपने कभी उस पीड़ा को सुना है जो कागज़ पर अक्षरों के रूप में उतरकर एक दहाड़ बन जाती है?
आप अपनी सुविधा के अनुसार कलम को नक्सली कह सकते हैं, आतंकी का तमगा दे सकते हैं या फिर उसे शहरी लेखक कहकर उसकी धार को भोथरा करने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन सत्य यह है कि कलम इन संकीर्ण परिभाषाओं से कहीं ऊपर है। मेरी नज़र में तो कलम सबसे पहले दो ही भावों को जन्म देती है – क्षमा और करुणा। यह वह संवेदना है जो अन्याय, पीड़ा और शोषण को देखकर स्वतः ही मुखर हो उठती है। यह वह मानवीय गुण है जो हमें दूसरे की तकलीफ को महसूस करने और उसके निवारण के लिए प्रेरित करता है। और यदि कलम में यह करुणा है, तो वह स्वाभाविक रूप से उन लोगों के साथ खड़ी होगी जो पीड़ित हैं, चाहे उनका कोई भी नामकरण किया जाए।
हमें तो आपका यह उपहार भी स्वीकार है, आपकी हर आलोचना, हर प्रतिबंध। क्योंकि हम जानते हैं कि जब कलम सच लिखती है, तो वह अक्सर असहज करती है। लेकिन कलम को कुछ भी कहने से पहले, उसे किसी भी खेमे में बाँटने से पहले, अपने भीतर उस जिम्मेदारी को लेकर आइए जो एक निष्पक्ष और सत्यनिष्ठ आवाज की होती है। कलम न किसी राजनीतिक दल की बंधुआ है, न किसी विचारधारा की गुलाम। वह तो उस सर्वहारा की सबसे मजबूत आवाज है, उस आम आदमी की चीख है जिसे अक्सर सत्ता के शोर में अनसुना कर दिया जाता है।
इतिहास के पन्नों को पलटकर देखिए। ऋषि वाल्मीकि का वह वृतांत कैसे भुलाया जा सकता है जब एक शिकारी के बाण से घायल क्रौंच पक्षी के वियोग में व्याकुल मादा पक्षी को देखकर उनकी कलम से करुणा का वह श्लोक निसृत हुआ था – “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती समा। यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्।।” यह मात्र एक छंद नहीं था, यह अन्याय के विरुद्ध उठी पहली साहित्यिक आवाज़ थी, एक करुणा से भरा विद्रोह था।
और प्रेमचंद ने ऐसे ही कलम को ‘सिपाही’ की उपाधि नहीं दी थी। यह सिपाही बिना किसी हथियार के लड़ता है, इसकी शक्ति इसकी सच्चाई और इसकी पहुँच में निहित है। यह उन दुर्गम कोनों तक पहुँचता है जहाँ सत्ता की आवाज़ भी मंद पड़ जाती है, और उन कहानियों को बयां करता है जिन्हें अक्सर छिपा दिया जाता है।
दरअसल, कलम ही वह निर्भीक आवाज है जो सत्ता को चुनौती देने का साहस रखती है। इसलिए, हे नीति निर्धारकों, आपका घबराना स्वाभाविक है। जब कलम आपकी नीतियों पर सवाल उठाती है, आपकी कमियों को उजागर करती है, तो आप उसे अपना दुश्मन मानने लगते हैं। आप भूल जाते हैं कि एक स्वस्थ लोकतंत्र में आलोचना और असहमति की आवाजें उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी कि सत्ता की अपनी आवाज। कलम का विरोध करना, वास्तव में उन लाखों आवाजों का दमन करना है जो न्याय और समानता की उम्मीद लगाए बैठी हैं।
जीवन पर चाहे जितने भी पहरे हों, सत्य को दबाने के कितने भी प्रयास किए जाएं, कलम हमेशा शांति की पक्षधर होती है। यह हिंसा का समर्थन नहीं करती, बल्कि उन कारणों की पड़ताल करती है जो हिंसा को जन्म देते हैं। यह संवाद और समझ का सेतु बनाती है, और अंततः एक ऐसे समाज की कल्पना करती है जहाँ हर आवाज सुनी जाए और हर व्यक्ति सम्मान के साथ जी सके।
इसलिए, हे सत्ता के कर्णधारों, कलम को शत्रु समझने की भूल न करें। इसे एक मित्र, एक मार्गदर्शक और एक चेतावनी के रूप में स्वीकार करें। इसकी आवाज को दबाने की बजाय, उसमें छिपी सच्चाई को समझने का प्रयास करें। क्योंकि जब कलम सच लिखती है, तो वह न केवल मज़लूमों की आवाज़ बनती है, बल्कि वह आपके लिए भी एक बेहतर, न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज का निर्माण करने का मार्ग प्रशस्त करती है। इस उपहार को स्वीकार कीजिए, और कलम की शक्ति को सकारात्मक बदलाव के लिए उपयोग कीजिए। यही एक समृद्ध और समावेशी राष्ट्र का सच्चा मार्ग है।

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Author: SPP BHARAT NEWS

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