अमेरिकी ‘टैरिफ़ वॉर’ का वैश्विक कहर, भारत की कमजोर अर्थव्यवस्था ‘ब्लैक मंडे’ का शिकार

लखनऊ, 9 अप्रैल 2025: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की हठधर्मिता और अहंकारपूर्ण नीतियां एक बार फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए संकट का सबब बन गई हैं। उनके द्वारा छेड़े गए ‘टैरिफ़ वॉर’ ने अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में भारी उथल-पुथल मचा दी है, जिसका खामियाजा भारत जैसे कमजोर औद्योगिक आधार वाले देशों को भुगतना पड़ रहा है। सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में आई ऐतिहासिक गिरावट, जिसे अब ‘ब्लैक मंडे’ के नाम से जाना जा रहा है, इसी वैश्विक आर्थिक सुनामी का प्रत्यक्ष परिणाम है।
बाजार खुलने के साथ ही सेंसेक्स और निफ्टी में ऐसी अभूतपूर्व गिरावट दर्ज की गई कि यह दिन शेयर बाजार के इतिहास के पांच सबसे बुरे दिनों में शुमार हो गया। हालांकि, मंगलवार को मामूली सुधार देखा गया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों के लिए यह बुरा दौर अभी समाप्त होने वाला नहीं है।
ट्रम्प का टैरिफ़ आक्रमण और भारत पर दोहरा मार:
शेयर बाजार के जानकारों और अर्थशास्त्रियों का स्पष्ट मत है कि भारतीय शेयर बाजार को इस झटके से उबरने में लंबा समय लग सकता है। इसकी मुख्य वजह यह है कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने जिन देशों पर सबसे अधिक टैरिफ़ लगाए हैं, उनमें भारत भी शामिल है। वैश्विक अर्थव्यवस्था की परस्पर निर्भरता के कारण, अमेरिका की इस संरक्षणवादी नीति का सीधा और नकारात्मक प्रभाव भारतीय बाजारों पर पड़ रहा है। चीन, जिसकी अर्थव्यवस्था का विनिर्माण क्षेत्र काफी मजबूत है, इस चुनौती का अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से मुकाबला कर रहा है और वैश्विक निवेशकों के लिए एक नए आशाजनक केंद्र के रूप में उभर रहा है। हालांकि ट्रम्प ने चीन पर 50% तक टैरिफ़ लगाने की धमकी दी है, लेकिन चीन की औद्योगिक क्षमता को देखते हुए माना जा रहा है कि वह इस दबाव को झेल सकता है।
असली समस्या भारत के लिए है, जिसने पिछले कुछ दशकों में अपने औद्योगिक आधार को पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं किया है। आंकड़ों में भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था विशालकाय दिखती हो, लेकिन वास्तविकता यह है कि कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विकास की गति धीमी पड़ गई है और आम लोगों की आय में भारी गिरावट दर्ज की गई है। ऐसी कमजोर नींव पर खड़ी अर्थव्यवस्था वैश्विक झटकों को आसानी से झेल पाने में सक्षम नहीं है।
सरकार की रहस्यमय चुप्पी और निवेशकों में घबराहट:
इस गंभीर आर्थिक संकट के समय में भी भारत सरकार का रवैया निराशाजनक और चिंताजनक है। टैरिफ़ वॉर से देश कैसे निपटेगा और सरकार इस दिशा में क्या कदम उठा रही है, इस बारे में वित्त मंत्रालय की ओर से कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया गया है। सरकार की यह चुप्पी भारतीय बाजार में आशंका और घबराहट को और बढ़ा रही है। विदेशी निवेशक, जो भारतीय शेयर बाजार में लाभ की संभावनाओं को लेकर पहले से ही बहुत आश्वस्त नहीं हैं, इस अनिश्चितता के माहौल में और भी सतर्क हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से बड़े पैमाने पर निकलने लगते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की अर्थव्यवस्था में विश्वास तेजी से कम होगा और रिकवरी की प्रक्रिया और भी धीमी हो जाएगी।
बाजार के जानकारों का मानना है कि सरकार को तत्काल बाजार के बचाव से संबंधित ठोस कदमों की घोषणा करनी चाहिए। हालांकि, वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि सरकार ने शेयर बाजार और स्थानीय निवेशकों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। यह ध्यान देने योग्य है कि पिछले लगभग नौ महीनों में भारतीय शेयर बाजार पहले से ही कमजोर रहा है और कई ऐसे दिन आए हैं जब निवेशकों ने एक ही दिन में लाखों करोड़ रुपये गंवाए हैं।
चुनाव पूर्व का जुमला और चंद कंपनियों का वर्चस्व:
यह याद दिलाना महत्वपूर्ण है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से लोगों से शेयर खरीदने का आग्रह किया था। उन्होंने दावा किया था कि 4 जून को आने वाले चुनाव परिणामों में भारतीय जनता पार्टी और उसके गठबंधन को 400 से अधिक सीटें मिलेंगी, जिससे निवेशकों को भारी लाभ होगा। इस आह्वान के बाद, कई लोगों ने जमकर शेयर खरीदे थे, खासकर उन कंपनियों के शेयरों में जो कथित तौर पर भाजपा सरकार के करीबी लोगों से संबंधित थीं।
हालांकि, चुनाव के परिणाम उम्मीदों के विपरीत आए, जिसके कारण शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई और निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस दौरान, धूर्त कारोबारियों ने बाजार में अस्थिरता का फायदा उठाते हुए मुनाफा कमाया, पहले बेचकर और फिर गिरते बाजार में खरीदकर। बाजार के जानकारों का मानना है कि कुछ खास लोगों को लाभ पहुंचाने की सरकार की मंशा ही शेयर बाजार की कमजोरी का एक बड़ा कारण है। पहले, कंपनियों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होने के कारण निवेशक विभिन्न कंपनियों में निवेश करते थे, जिससे एक जगह नुकसान होने पर दूसरी जगह लाभ की संभावना बनी रहती थी। लेकिन अब, लाभ कमाने वाली कंपनियों की संख्या सीमित हो गई है। यदि इन चंद कंपनियों के शेयर गिरते हैं, तो निवेशकों का पैसा डूबना स्वाभाविक है, क्योंकि सरकार कथित तौर पर कुछ ही कारोबारियों को संरक्षण और प्रोत्साहन दे रही है।
निष्कर्ष: अदूरदर्शी नीतियां और कमजोर अर्थव्यवस्था:
सरकार का वर्तमान रवैया, जिसमें चंद कंपनियों को तरजीह दी जा रही है, पूरे व्यवसाय जगत और शेयर बाजार को कुछ ही कंपनियों पर निर्भर बना देता है। ऐसे में, बाहरी झटकों से बाजार की रक्षा करना मुश्किल हो जाता है। शेयर बाजार को इस तरह के नुकसान से बचाने के लिए सरकार को कंपनियों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाना होगा। केवल कुछ कारोबारियों को संरक्षण देकर सरकार उन्हें अमीर तो बना सकती है, लेकिन इससे एक मजबूत और टिकाऊ अर्थव्यवस्था का निर्माण नहीं हो सकता जो वैश्विक अस्थिरता का सामना कर सके।
अर्थशास्त्र के जानकारों का मानना है कि वर्तमान सरकार में अच्छी आर्थिक समझ रखने वाले लोगों की कमी है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी जैसे शासक अपने अदूरदर्शी कदमों, जैसे कि नोटबंदी और जीएसटी, से पहले ही देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर चुके हैं। अब, शेयर बाजार में आई यह नई सुनामी भारत को और कितना नुकसान पहुंचाती है, यह देखना बाकी है। सरकार को तत्काल जागना होगा और ठोस आर्थिक नीतियों के साथ बाजार में विश्वास बहाल करने के लिए कदम उठाने होंगे, अन्यथा ‘ब्लैक मंडे’ की यह काली छाया भारतीय अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक परेशान करती रहेगी।
Author: SPP BHARAT NEWS






