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संचय – वृद्धि और श्रमिक का विस्थापन: पूंजीवाद की अनिवार्य त्रासदी

संचय – वृद्धि और श्रमिक का विस्थापन: पूंजीवाद की अनिवार्य त्रासदी

पूंजीवाद के आर्थिक ढाँचे को समझने के लिए ‘संचय’ (Accumulation) और ‘वृद्धि’ (Growth) को केंद्र में रखकर देखना अत्यंत आवश्यक है। यह व्यवस्था केवल उत्पादन और उपभोग का सिलसिला नहीं है, बल्कि यह सामाजिक-आर्थिक संबंधों की एक जटिल संरचना है, जिसमें श्रमिक की भूमिका लगातार संकटग्रस्त होती जाती है।

पूंजीवाद को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि यह वह व्यवस्था है जहाँ वस्तुएँ मुनाफे के उद्देश्य से, श्रम का उपयोग कर, बाज़ार में बिक्री हेतु उत्पादित की जाती हैं। मुनाफा ही इसका ध्येय है, और मुनाफे की प्राप्ति बाजार में सफल प्रतिस्पर्धा पर निर्भर करती है। इस प्रतिस्पर्धा में वही पूंजीपति टिक पाता है जो अधिक निवेश करे, तकनीक उन्नत बनाए, उत्पादन बढ़ाए और लागत घटाए।

इस प्रक्रिया का केंद्रीय सिद्धांत है—”संचय”, अर्थात मुनाफे को पुनः उत्पादन में निवेश करना। यह संचय ही ‘विस्तारित पुनरुत्पादन’ को जन्म देता है, जिसकी अवधारणा कार्ल मार्क्स ने दी थी। पूंजीवाद से पूर्व के समाजों में उत्पादन मुख्यतः उपभोग के लिए होता था और अतिरिक्त उत्पादन का समाज में ही उपभोग हो जाता था। लेकिन पूंजीवाद में यह अतिरिक्त मूल्य (Surplus Value) संचय के रूप में उत्पादन प्रणाली में वापस आता है और प्रणाली को लगातार विस्तार की ओर ले जाता है।

संचय की अनिवार्यता और श्रमिक का संकट

विस्तारित पुनरुत्पादन की यह प्रणाली अनिवार्य रूप से श्रमिकों को दो विकल्पों के बीच धकेलती है—या तो उन्हें अधिक श्रम करना पड़ेगा, या उनकी जगह मशीनें ले लेंगी। मार्क्स ने इसे निरपेक्ष और सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य की संज्ञा दी।

निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य बढ़ाने के लिए काम के घंटे बढ़ाए जाते हैं, वेतन घटाया जाता है, या कार्यभार बढ़ाया जाता है। यह सीधे श्रमिक की जीवन गुणवत्ता को प्रभावित करता है, जिससे असंतोष और प्रतिरोध की स्थिति उत्पन्न होती है।

इसके विपरीत, सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य मशीनों के उपयोग से बढ़ाया जाता है, जिससे प्रति यूनिट उत्पादन पर श्रमिक का श्रम घटता है। परंतु, इसका प्रभाव और भी गहरा होता है—छोटे उत्पादक दिवालिया हो जाते हैं, बेरोजगारी बढ़ती है और एक अस्थायी मज़दूर वर्ग (औद्योगिक रिज़र्व आर्मी) तैयार होता है, जिसे आवश्यकता अनुसार प्रयोग किया जा सकता है।

बेरोजगारी: पूंजीवाद की प्रणालीगत अनिवार्यता

यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि बेरोजगारी पूंजीवाद की विफलता है; यह उसकी कार्यप्रणाली का हिस्सा है। यदि सभी लोग रोज़गार में आ जाएँ, तो श्रमिक की सौदेबाज़ी शक्ति बढ़ जाएगी, जिससे मज़दूरी में वृद्धि होगी और मुनाफा घटेगा। इसलिए, पूंजीपति वर्ग हमेशा एक ‘रिज़र्व आर्मी ऑफ लेबर’ बनाए रखने को बाध्य होता है—जो आवश्यकतानुसार जोड़ी या निकाली जा सके।

आज जब भारत जैसे देशों में श्रम सुधारों के नाम पर श्रमिकों से 12 घंटे काम लेने की मांग हो रही है, और यंत्रीकरण को विकास का पर्याय बना दिया गया है, तब यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि यह वृद्धि किसके लिए है? क्या यह सामाजिक समृद्धि है या कुछ हाथों में संकेंद्रित संचय?

निष्कर्ष: विकास की अवधारणा पर पुनर्विचार की आवश्यकता

पूंजीवादी विकास की यह दौड़ हमें बार-बार यह सोचने को विवश करती है कि क्या ‘सफलता’ का अर्थ केवल उत्पादन और मुनाफे की वृद्धि है? क्या श्रमिक की गरिमा, सामाजिक न्याय और समता का कोई स्थान इस व्यवस्था में है? संचय की गति तेज़ हो सकती है, तकनीक अत्याधुनिक हो सकती है, पर यदि समाज का श्रमिक वर्ग हाशिये पर खड़ा है, तो वह व्यवस्था अंततः सामाजिक विघटन ही लाएगी।

इसलिए यह अनिवार्य हो जाता है कि हम उस विकास मॉडल पर पुनर्विचार करें जो श्रम को विस्थापित कर केवल पूंजी की सेवा में समर्पित हो गया है। हमें उत्पादन के नए वैकल्पिक ढाँचों की आवश्यकता है—जहाँ संचय केवल कुछ के लिए न हो, बल्कि समाज की व्यापक भलाई के लिए हो।

SPP BHARAT NEWS
Author: SPP BHARAT NEWS

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