“कॉफ़िन हवा में, स्कूटर कबाड़ में: मिग, स्क्रैप नीति और भारत का पर्यावरणीय पाखंड”
I. जब नीति ‘विकास’ की नहीं, ‘वर्ग’ की होती है
एक ओर भारत “आजादी का अमृत महोत्सव” मना रहा है, तो दूसरी ओर 21वीं सदी का यह देश आज भी 1960 के दशक के मिग-21 जैसे जर्जर लड़ाकू विमानों को उड़ाने को मजबूर है—जिन्हें खुद वायुसेना में “Flying Coffin” कहा जाता है।
उधर सरकार हर आम नागरिक की 10–15 साल पुरानी गाड़ी को एक आक्रामक व्हीकल स्क्रैप पॉलिसी के तहत सड़कों से हटाने पर आमादा है—चाहे वह गाड़ी पूरी तरह सुरक्षित, प्रदूषण-मुक्त और उपयोगी ही क्यों न हो।
यह लेख भारत की रक्षा नीति, वाहन स्क्रैप नीति और पर्यावरणीय न्याय के उस असंतुलन की पड़ताल करता है, जिसमें नीति अब समानता नहीं, बल्कि वर्गीय सुविधा का उपकरण बन चुकी है।
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II. मिग-21 और रक्षा नीति की निष्क्रियता
भारत 1960 से मिग-21 का इस्तेमाल कर रहा है। अब तक यह विमान 400 से अधिक बार क्रैश हो चुका है और 200 से ज्यादा पायलटों की जान ले चुका है।
हर हादसे के बाद कुछ दिन मीडिया में शोक, फिर मौन।
हालांकि दो दशक पहले यह निर्णय हो चुका था कि मिग-21 को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा, लेकिन:
तेजस कार्यक्रम में देरी,
रक्षा बजट की प्राथमिकता में असंतुलन,
और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी
…ने इस प्रक्रिया को खींचकर अनिश्चितकालीन बना दिया है।
क्या 2024 के भारत को अब भी मिग उड़ाना चाहिए?
उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
लेकिन मिग उड़ते रहेंगे, क्योंकि उनके लिए कोई “स्क्रैप नीति” नहीं है।
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III. स्क्रैप नीति: एक सजावटी पर्यावरणीय पर्दा
2021 में घोषित नई व्हीकल स्क्रैप पॉलिसी कहती है:
15 साल से अधिक पुराने निजी वाहन और 10 साल से ज्यादा पुराने कमर्शियल वाहन यदि फिटनेस टेस्ट में फेल हों, तो स्क्रैप किए जाएँ।
मोटर वाहन कर, रजिस्ट्रेशन फीस आदि को बढ़ाकर पुराने वाहनों को आर्थिक रूप से अनुपयोगी बना दिया गया।
तर्क: प्रदूषण घटाना, सड़क सुरक्षा बढ़ाना, और ऑटो उद्योग को बढ़ावा देना।
सच्चाई:
1. तकनीकी स्थिति की बजाय सिर्फ उम्र को प्राथमिकता मिली।
2. सरकारी और सार्वजनिक परिवहन की कोई जवाबदेही तय नहीं की गई।
3. ग्रामीण भारत और निम्न-मध्यम वर्ग के जीवन यथार्थ की उपेक्षा की गई।
नतीजा:
ऊँचे वर्ग के लोग अपनी गाड़ियाँ “अपग्रेड” करते हैं, और मध्यमवर्ग ऋण लेकर नई गाड़ी खरीदने को मजबूर होता है — भले ही पुरानी गाड़ी पूरी तरह चालू हो।
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IV. पर्यावरणीय न्याय: जिसके नाम पर अन्याय हो रहा है
पर्यावरणीय न्याय का अर्थ है—नीतियों का लाभ और बोझ सभी वर्गों पर समान रूप से वितरित हो।
लेकिन भारत की स्क्रैप नीति:
छोटे वाहन स्वामियों पर कठोर है,
जबकि उद्योग, बिल्डिंग निर्माण, और सरकारी परिवहन जैसी भारी प्रदूषणकारी गतिविधियों को छूट देती है।
कुछ अहम सवाल:
- क्या एक 15 साल पुरानी Hero Honda स्कूटर सचमुच एक बोइंग 747 से ज्यादा प्रदूषण फैलाती है?
- क्या महंगे EV लाकर आप करोड़ों निम्न-मध्यमवर्गीय नागरिकों को पर्यावरण के नाम पर नई गाड़ी खरीदने को बाध्य कर सकते हैं?
- क्या सरकार खुद अपनी पर्यावरणीय जवाबदेही से मुक्त है?
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V. नीतियों का टकराव: एक तुलनात्मक विश्लेषण
विषय रक्षा नीति स्क्रैप नीति पर्यावरणीय न्याय
उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा प्रदूषण नियंत्रण सामाजिक-आर्थिक संतुलन
व्यवहार पुरानी तकनीक जारी नई तकनीक की मजबूरी केवल कुछ वर्गों पर लागू
नुकसान किसे? पायलट, सैन्य बल मध्यम वर्ग, मजदूर वर्ग गरीब और ग्रामीण वर्ग
लाभ किसे? राजनीतिक असफलताओं को छुपाना ऑटोमोबाइल कंपनियाँ अमीर वर्ग का “ग्रीन ब्रांड”
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VI. जब नीति वर्ग-आधारित हो जाती है
यह अक्षम्य विरोधाभास है कि:
एक पायलट मिग-21 में मारा जा सकता है,
एक गरीब किसान का ट्रैक्टर 20 साल तक चल सकता है,
लेकिन एक शिक्षक की Hero Honda सिर्फ 15 साल पुरानी होने पर अवैध हो जाती है।
जब तक नीतियाँ जनपक्षीय, तथ्य-आधारित, और वर्ग-संवेदनशील नहीं होंगी, तब तक हर “हरित नीति” सिर्फ टैक्स वसूली का और “रक्षा नीति” केवल नारों और श्रद्धांजलियों का माध्यम बनी रहेगी।
निष्कर्ष:
पर्यावरण की रक्षा केवल नीति बनाकर नहीं होती — न्याय से होती है।
और न्याय तब ही संभव है जब नीति हर भारतीय की ज़िन्दगी को बराबरी से देखे — चाहे वह स्कूटर चला रहा हो या मिग।
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Author: SPP BHARAT NEWS






