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जन्माष्टमी : भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण का पावन पर्व

जन्माष्टमी : भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण का पावन पर्व

लेख संकलन : नविन चंद्र प्रसाद, वरिष्ठ पत्रकार एवं कोआर्डिनेटर – झारखंड, एसपीपी भारत न्यूज

भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। यही वह शुभ तिथि है, जब षोडश कलासंपन्न, योगेश्वर और गीता के गायक भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ था। उनका जीवन, उपदेश और आचरण भारतीय समाज के लिए आदर्श बन गए और वे आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं के आराध्य देवता हैं।

श्रीकृष्ण – विष्णु के आठवें अवतार

हिंदू मान्यताओं के अनुसार श्रीकृष्ण, भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं। यद्यपि ईश्वर निराकार और सर्वव्यापी है, फिर भी भक्तों की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए समय-समय पर वह साकार रूप में अवतरित होता है। इसी परंपरा में भगवान विष्णु ने देवकी-वसुदेव के पुत्र के रूप में कृष्णावतार धारण किया।
उनके अवतरण का उद्देश्य स्पष्ट था –

परित्राणाय साधूनाम् (सज्जनों की रक्षा)

विनाशाय च दुष्कृताम् (दुष्टों का विनाश)

धर्मसंस्थापनार्थाय (धर्म की पुनःस्थापना)

बहुआयामी व्यक्तित्व

श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बहुमुखी और अनुपम था –

वे अद्वितीय योद्धा थे, पर उनकी वीरता सदा धर्म और लोककल्याण के लिए रही।

वे कुशल राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने सुशासन और राजधर्म की स्थापना की।

वे महान ज्ञानी और दार्शनिक थे, जिन्होंने मानव जीवन को योग, भक्ति और कर्म के मार्ग से दिशा दिखाई।

वे केवल योगी नहीं, बल्कि योगेश्वर थे – योग के परम ज्ञाता, व्याख्याता और प्रेरक।

गीता में उन्होंने योग को परिभाषित किया –
“समत्वं योग उच्यते” अर्थात सुख-दुःख, लाभ-हानि में समानता और कर्म में कौशल ही योग है।

गीता का अमृतमय उपदेश

महाभारत युद्धभूमि में जब अर्जुन मोहग्रस्त हुए, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें निर्भय होकर धर्मयुद्ध में प्रवृत्त होने का उपदेश दिया।
उनकी वाणी से निःसृत भगवद्गीता ने संसार को जीवन जीने की सर्वोत्तम दिशा दी –

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” – कर्म करो, फल की चिंता मत करो।

“हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप” – दुर्बलता त्यागकर उठो और कर्तव्य निभाओ।

इसी कारण श्रीकृष्ण को जगद्गुरु की उपाधि मिली और आज भी उन्हें “कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्” कहकर स्मरण किया जाता है।

युगपुरुष और युगावतार

बाल्यावस्था में ही उन्होंने कंस, चाणूर, मुष्टिक और शिशुपाल जैसे दुष्टों का संहार किया। कूटनीति से जरासंध, कालयवन और कौरवों का विनाश कर धर्म की स्थापना की।
उन्होंने ज्ञान, कर्म और भक्ति – इन तीनों मार्गों का अद्भुत समन्वय कर भागवत धर्म की नींव रखी।

पूर्णावतार की महिमा

भागवत पुराण में श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है। उनका अवतरण केवल एक युग की आवश्यकता नहीं था, बल्कि वह युगों-युगों तक मानवता के लिए प्रकाशस्तंभ है।
उनके उपदेश और कर्म आज भी हर व्यक्ति को प्रेरणा देते हैं –

न्याय और धर्म की रक्षा

सत्य और करुणा का पालन

कर्म में निष्ठा और भक्ति में श्रद्धा

निष्कर्ष

जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नहीं है, बल्कि यह धर्म, ज्ञान और भक्ति के संगम का पावन पर्व है।
उनकी गीता आज भी हमें यही सिखाती है कि –
???? सच्चा धर्म कर्म है,
???? सच्चा योग समत्व है,
???? और सच्ची भक्ति मानवता की सेवा है।

✨ सभी को पावन जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ..???? नवीन चंद्र प्रसाद✨
SPP BHARAT NEWS
Author: SPP BHARAT NEWS

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