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आत्म साक्षात्कार : साधक की सर्वोच्च आकांक्षा

आत्म साक्षात्कार : साधक की सर्वोच्च आकांक्षा

आत्म साक्षात्कार या परमात्मा मिलन — यह साधक के अन्तर्मन से उद्भूत सर्वोच्च आकांक्षा है। जब तक कोई साधक सिद्धि प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक यह दिव्य आकांक्षा उसकी साधना-यात्रा का आधार बनी रहती है।

क्या यह केवल कल्पना है?

प्रश्न उठता है कि यह आकांक्षा मात्र कल्पना है या इसके पीछे कोई वास्तविक सत्य छिपा है?

अनात्मवादी दृष्टि से यह एक कल्पना भर है, क्योंकि जिनके लिए आत्मा का अस्तित्व ही नहीं है, उनके लिए आत्म साक्षात्कार असंभव है।

आत्मवादी दृष्टि में आत्मा का अस्तित्व शाश्वत है। आत्मा पहले भी थी, वर्तमान में भी है और भविष्य में भी रहेगी। आत्मा का साक्षात्कार संभव है और इसमें संदेह नहीं किया जा सकता।

आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध

आत्मा का अर्थ है — शुद्ध चैतन्य। समस्त विजातीय तत्वों से आत्मा को मुक्त करना ही आत्मा को प्रत्यक्ष रूप से देखना है।

कुछ दार्शनिक मानते हैं कि आत्मा, परमात्मा का ही अंश है।

वहीं कुछ की धारणा है कि आत्मा और परमात्मा अलग-अलग तत्व हैं। ऐसे लोग मानते हैं कि विशेष साधकों को भगवान के दर्शन होते हैं।

भक्ति में अनुभव का रहस्य

भगवान के स्वरूप की कल्पना हर साधक के लिए अलग होती है। कोई माँ काली को देखता है, कोई भगवान विष्णु को, तो कोई शिवशंकर को। इसका कारण मन की एकाग्रता है। जिस रूप या भाव में मन पूरी तरह लीन हो जाता है, वही स्वरूप साधक के सम्मुख प्रकट होता है।

भाव क्रिया और साधना का महत्व

मन की एकाग्रता भाव क्रिया से सिद्ध होती है। यदि भाव क्रिया न हो तो साधक की स्थिति विरोधाभासी हो जाती है — सोच कुछ और, और करना कुछ और। जब तक सोच और आचरण में एकात्मता नहीं होती, तब तक न आत्म साक्षात्कार संभव है और न ही कोई अन्य कार्य सफल हो सकता है।

???? निष्कर्ष यह है कि आत्म साक्षात्कार कोई काल्पनिक उड़ान नहीं, बल्कि साधक के लिए ठोस और जीवंत यथार्थ है। इसकी प्राप्ति हेतु भाव-क्रिया, एकाग्रता और साधना का निरंतर अभ्यास आवश्यक है।

✍️ लेखक : नवीन चन्द्र प्रसाद
SPP BHARAT NEWS
Author: SPP BHARAT NEWS

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