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अरावली का ‘डेथ वारंट’: विकास की भूख या विनाश का खेल?

अरावली का ‘डेथ वारंट’: विकास की भूख या विनाश का खेल? 

दिनांक: 22 दिसंबर 2025
अरावली, दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े दावे करने वाली केंद्र सरकार के फैसलों ने इसे गंभीर खतरे में डाल दिया है। विकास के नाम पर प्रकृति की बलि चढ़ाने का यह खेल न केवल आने वाली पीढ़ियों के साथ धोखा है, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरण और भूगोल को हमेशा के लिए बदल देने की साजिश भी।

परिभाषा का छल और पहाड़ों का कत्ल

दो अरब साल पुरानी अरावली पर्वतमाला को अब एक ‘सरकारी परिभाषा’ ने चुनौती दे दी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई कमेटी की सिफारिश में पहाड़ों को मापने का 100 मीटर का मानक तय किया गया है। भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के आंकड़ों के अनुसार, इस मानक से अरावली का लगभग 91.3% हिस्सा कागजों पर ‘पहाड़’ नहीं रहेगा। यानी 99 मीटर ऊंची पहाड़ी को अब खनन के लिए खुला छोड़ दिया जाएगा।
यह बदलाव उद्योगपतियों के हितों को साधने का रास्ता है। अरावली ने सदियों से थार मरुस्थल को दिल्ली-हरियाणा की ओर बढ़ने से रोका है, लेकिन अब यह बेसहारा हो गई है।

संवैधानिक संस्थाओं की चुप्पी पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरणविदों की चेतावनियों को नजरअंदाज कर सरकारी कमेटी की सिफारिशों को मंजूरी दे दी। न्यायमित्र के. परमेश्वर ने चेताया था कि यह परिभाषा खनन माफिया के लिए रास्ता साफ करेगी, लेकिन अदालत ने इसे अनसुना कर दिया। दिल्ली को प्रदूषण से गैस चैंबर बनाने वाले कारकों और सालाना हजारों मौतों के आंकड़ों पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया।

चंदे की राजनीति और प्रकृति का दोहन

इस फैसले के पीछे वन संरक्षण अधिनियम के संशोधन और कॉर्पोरेट हित जुड़े हैं। आरोप है कि चुनावी चंदे के बदले प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा है। एक ओर उद्योगपतियों को छूट, दूसरी ओर चंबल, साबरमती जैसी नदियों के स्रोत को खतरा।

अब जागने का वक्त है

2018 में सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्ट में राजस्थान में 31 पहाड़ियां गायब होने की बात कही गई थी। आज अरावली को बचाना सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं, उत्तर भारत के अस्तित्व का सवाल है। सोनिया गांधी ने इसे ‘डेथ वारंट’ कहा है – और यह सही है।
यदि आज नहीं जागे, तो कल कुछ नहीं बचेगा। दो अरब साल पुरानी यह धरोहर किसी कमेटी के फैसले से मिट्टी में नहीं मिलनी चाहिए। जनता और न्यायपालिका को जागना होगा, वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा

नोट: यह लेख पर्यावरण संरक्षण की पुकार है। अरावली को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। #SaveAravalli

SPP BHARAT NEWS
Author: SPP BHARAT NEWS

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