“धर्म रक्षा के महान योद्धा — गुरु गोविन्द सिंह”
सांस्कृतिक चेतना, शौर्य और आत्मबलिदान की अमर प्रतिमूर्ति
गुरु गोविन्द सिंह जी भारतीय सांस्कृतिक चेतना के ऐसे उज्ज्वल स्तंभ थे, जिन्होंने सुषुप्त, निर्बल और शौर्यहीन होती जा रही समाज-चेतना में नवप्राण फूँक दिए। वे केवल एक संत या समाज-सुधारक ही नहीं, बल्कि महान योद्धा, संगठनकर्ता और उच्च कोटि के कवि भी थे। उनका सम्पूर्ण जीवन अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, धर्म की रक्षा और आत्मसम्मान की स्थापना का महाकाव्य है।
गुरु हरगोविन्द जी ने अपने पिता गुरु अर्जुन देव जी की जहाँगीर द्वारा दी गई अमानवीय यातना और अकाल मृत्यु के पश्चात शांतिप्रिय सिख समुदाय को सैन्य स्वरूप देने की प्रक्रिया आरंभ की थी। गुरु गोविन्द सिंह जी ने उसी प्रक्रिया को पूर्णता तक पहुँचाया और सिख धर्म को एक सशक्त, अनुशासित तथा शौर्यपूर्ण पहचान प्रदान की।
खालसा पंथ की स्थापना : साहस की अनुपम लीला
सिख समाज की मानसिकता में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने हेतु गुरु गोविन्द सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में बैसाखी के पावन अवसर पर एक अद्भुत ऐतिहासिक लीला रची। उन्होंने देश और धर्म पर छाए संकट के काले बादलों को दूर करने के लिए बलिदान की माँग की। सभा में सन्नाटा छा गया। गुरु ने अपनी ललकार तीन बार दोहराई।
एक-एक कर पाँच वीर आगे आए और गुरु की कनात में प्रविष्ट हुए। प्रत्येक बार गुरु रक्तरंजित तलवार लेकर बाहर आए, जिससे उपस्थित जनसमूह स्तब्ध रह गया। अंततः गुरु ने उन पाँचों को सुरक्षित बाहर लाकर घोषणा की—
“ये पाँच ‘प्यारे’ हैं—धर्म के खालिस अर्थात शुद्ध सेवक। आज से इन्हीं के साथ खालसा पंथ की नींव रखी जाती है।”
ये पाँच प्यारे थे—
लाहौर के दयाराम
दिल्ली के जाट धर्मदास
द्वारका के धोबी मुहकमचंद
बीदर के नाई साहिबचंद
जगन्नाथपुरी के रसोइया हिम्मत
यह घटना केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, समानता और साहस की अमर मिसाल थी।
सिख संगठन और पंच ककार
वर्तमान सिख समाज का संगठित स्वरूप मुख्यतः गुरु गोविन्द सिंह जी की देन है। उन्होंने पगड़ी को सम्मान और आत्मगौरव का प्रतीक बनाया तथा पंच ककार को सभी सिखों के लिए अनिवार्य किया—
केश, कंघा, कड़ा, कच्छा और कृपाण।
ये पाँच ककार केवल बाहरी चिह्न नहीं, बल्कि अनुशासन, आत्मरक्षा और नैतिक शक्ति के प्रतीक हैं।
मुग़ल अत्याचार और अद्भुत बलिदान
गुरु गोविन्द सिंह जी की तैयारियों से भयभीत होकर औरंगजेब ने आनंदपुर साहिब पर कठोर घेरा डाला, किंतु गुरु उसके हाथ नहीं आए। आनंदपुर से प्रस्थान के दौरान उनके दो छोटे साहिबज़ादे—
जोरावर सिंह (9 वर्ष) और फतेह सिंह (7 वर्ष)— बिछुड़ गए।
विश्वासघात के शिकार होकर वे सरहिंद के शासक वज़ीर ख़ाँ के हाथों सौंप दिए गए, जिसने उन्हें धर्म-परिवर्तन से इनकार करने पर दीवारों में ज़िंदा चिनवा दिया। यह बलिदान भारतीय इतिहास के सबसे मार्मिक और प्रेरणादायक अध्यायों में से एक है।
अंतिम संदेश : ग्रंथ ही गुरु
औरंगजेब की मृत्यु के बाद गुरु गोविन्द सिंह जी की बहादुर शाह से मैत्री हुई, किंतु उसी के शासनकाल में गोदावरी नदी के तट पर, निद्रावस्था में एक पठान द्वारा किए गए घातक प्रहार से उनका देहावसान हो गया।
स्वर्गारोहण से पूर्व उन्होंने ऐतिहासिक घोषणा की—
“अब से गुरु ग्रंथ साहिब ही खालसा पंथ के शाश्वत गुरु होंगे।”
यह निर्णय आध्यात्मिक लोकतंत्र और ज्ञान की सर्वोच्चता का अनुपम उदाहरण है।
शस्त्र और शास्त्र का संतुलन
गुरु गोविन्द सिंह जी का जीवन यह सिखाता है कि धर्म की रक्षा केवल उपदेश से नहीं, आवश्यकता पड़ने पर शौर्य से भी होती है। वे मानते थे कि जीवन-संघर्ष में विजय के लिए केवल शास्त्र ही नहीं, शस्त्र का भी साहसपूर्ण प्रयोग आवश्यक है—केवल ‘शाप’ नहीं, ‘शर’ भी।
सिख मत हिन्दू सांस्कृतिक परंपरा से ही उद्भूत हुआ वह सशक्त बाहु है, जिसने सदियों तक हिन्दुत्व की रक्षा की। सिखों के अतुलनीय बलिदानों का सबसे बड़ा लाभ भारतीय संस्कृति और हिन्दू समाज को मिला। इसके बावजूद आज भाषा और लिपि जैसे कृत्रिम भेदों के कारण हिन्दू-सिखों में वैमनस्य उत्पन्न होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
निष्कर्ष
गुरु गोविन्द सिंह जी केवल एक युगपुरुष नहीं, बल्कि साहस, त्याग और राष्ट्रीय चेतना के शाश्वत प्रतीक हैं। उनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उनके समय में थीं।
गुरु गोविन्द सिंह जी की जयंती पर उन्हें कोटिशः नमन।
— नवीन चन्द्र प्रसाद
Author: SPP BHARAT NEWS





