संत गुरु रविदास : समता, श्रम और सच्ची भक्ति के महान प्रवक्ता
संत गुरु रविदास जी 15वीं शताब्दी के महान संत, कवि, समाज-सुधारक, दार्शनिक और सच्चे ईश्वर-उपासक थे। वे भक्ति आंदोलन के ऐसे उज्ज्वल स्तंभ थे, जिन्होंने अपने जीवन और वाणी से सामाजिक समता, श्रम की महत्ता और आंतरिक पवित्रता का संदेश दिया।
“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” जैसे अमर पद के रचयिता संत रैदास स्वयं को माँ गंगा का वरद पुत्र मानते थे और फक्कड़ योगी के रूप में जीवन यापन करते थे।
अंतर्मन की पवित्रता ही सच्ची भक्ति
संत रविदास जी का स्पष्ट मत था कि सच्ची भक्ति बाहरी कर्मकांडों में नहीं, बल्कि अंतर्मन की शुद्धता में निहित है। उनका कहना था कि विनम्रता के साथ निरंतर कर्म करते रहना ही ईश्वर-भक्ति का वास्तविक मार्ग है।
“कह रैदास तेरी भगति दूरी है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक ह्वै चुनि खावै।”
इस पद के माध्यम से वे समझाते हैं कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है और अहंकार का त्याग कर विनम्रता से जीवन जीने वाला व्यक्ति ही सच्चा भक्त बन सकता है।
श्रम, समता और पाखंड-विरोध
संत रविदास जी ने जीवनभर श्रम की महत्ता पर बल दिया। उनकी अधिकांश ऊर्जा अपने समय के धार्मिक पाखंड, जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानताओं के विरुद्ध संघर्ष में लगी। वे भली-भांति जानते थे कि बिना इन कुरीतियों के उन्मूलन के समता, समानता और सहअस्तित्व की स्थापना संभव नहीं है।
उनका दृढ़ विश्वास था कि ईश्वर ने सभी मनुष्यों को एक समान बनाया है, अतः जाति और धर्म के नाम पर भेदभाव का कोई औचित्य नहीं है।
“सब में हरि है, हरि में सब है, हरि अपनों जिन जाना।
साखी नहीं और दूसरा, जानन हार सयाना।”
आत्मस्वीकृति और आत्मगौरव का संदेश
संत रविदास जी ने समाज द्वारा थोपे गए हीनभाव को कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने निर्भीक होकर कहा—
“जाति भी ओछी, करम भी ओछा, ओछा कसाब हमारा।
नीचे से प्रभु ऊँचा कियो है, कहे रविदास चमारा।”
यह पद आत्मस्वीकृति, आत्मगौरव और ईश्वर की कृपा में अटूट विश्वास का अद्भुत उदाहरण है।
समाज के लिए आज भी प्रासंगिक विचार
यदि संत रविदास जी के उपदेशों का अनुकरण किया जाए, तो न केवल व्यक्ति की अंतरात्मा शुद्ध और उज्ज्वल बनेगी, बल्कि समाज का भी कल्याण और उत्थान संभव होगा।
श्रेष्ठ विचार, सद्व्यवहार और परोपकार की भावना से प्रेरित कर्म ही सामाजिक असमानता, ईर्ष्या-द्वेष और लोभ जैसी बुराइयों को स्वतः समाप्त कर सकते हैं।
मीराबाई के आध्यात्मिक गुरु
संत रविदास जी की महत्ता इस तथ्य से भी सिद्ध होती है कि वे मध्यकाल की महान कृष्ण-भक्त कवयित्री मीराबाई के आध्यात्मिक गुरु थे। मीराबाई ने स्वयं अपने पदों में कहा है—
“गुरु मिलिया रविदास जी…”
कहा जाता है कि मीराबाई के आमंत्रण पर संत रैदास चित्तौड़गढ़ भी गए थे, किंतु उनके हृदय में माँ गंगा के प्रति प्रेम सदैव समान रहा।
रैदास पंथ और अमर विरासत
संत रविदास जी के आदर्शों और उपदेशों को मानने वाले भक्त रैदास पंथी कहलाते हैं। उन्होंने धार्मिक और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जो आवाज़ उठाई, वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक है।
संत गुरु रविदास जी भारतीय समाज को समता, मानवता और सच्ची भक्ति की दिशा दिखाने वाले युगद्रष्टा संत थे।
— नवीन चन्द्र प्रसाद
Author: SPP BHARAT NEWS



