✨ रामकृष्ण परमहंस : धर्म का जीवंत स्वरूप
जयंती विशेष | मानवीय मूल्यों के अमर साधक को श्रद्धासुमन
भारतवर्ष की परम्परा रही है कि यहाँ की जनता विद्या से आतंकित नहीं होती। वह पंडितों का सम्मान करती है, उनकी पूजा-अंधभक्ति नहीं। हम तर्क से पराजित होने वाली जाति नहीं हैं; किन्तु नम्रता, त्याग और उच्च चरित्र से अवश्य जीते जा सकते हैं। केवल “धर्म-धर्म” का घोष करने से धर्म का मर्म नहीं खुलता, और न ही मोटी-मोटी पोथियाँ रच देने से धर्म जनमानस में उतरता है।
दयानन्द सरस्वती, राजा राममोहन राय तथा एनी बेसेंट के प्रयासों से यह सिद्ध हुआ कि हिन्दू धर्म निन्दनीय नहीं, वरेण्य है; किन्तु जनता यह देखना चाहती थी कि धर्म का जीता-जागता स्वरूप कैसा होता है। यह स्वरूप उसे तब दिखाई पड़ा जब परमहंस रामकृष्ण का अवतरण हुआ (1836–1886)।
🌼 धर्म का सार्वभौमिक संदेश
भारत की धार्मिक समस्या का जो समाधान रामकृष्ण ने प्रस्तुत किया, वह अद्वितीय और अत्यंत उपयोगी है। उन्होंने क्रमशः वैष्णव, शैव, शाक्त, तान्त्रिक, अद्वैतवादी साधनाओं का अभ्यास किया; यहाँ तक कि इस्लाम और ईसाई मत का भी अनुभव किया। इस साधना के माध्यम से उन्होंने सिद्ध किया कि धर्मों के बाहरी रूप भिन्न हो सकते हैं, परन्तु उनके मूल तत्व में कोई अंतर नहीं।
उन्होंने कहा —
“शान्ति मार्ग से नहीं, अनुभूति से मिलती है।”
जब तक मनुष्य अनुभूति की ऊँचाई पर नहीं पहुँचता, तब तक यह सोचना व्यर्थ है कि वह हिन्दू है या मुसलमान। साधन अनेक हैं; कोई भी मार्ग अपनाया जा सकता है, लक्ष्य एक ही है — परम सत्य की अनुभूति।
🌿 आध्यात्मिक व्यक्तित्व की दिव्यता
हिन्दू धर्म की गहराई और माधुर्य की प्रतिमूर्ति थे रामकृष्ण। उनकी इन्द्रियाँ पूर्णतः वश में थीं। सांसारिक सुख, समृद्धि, यहाँ तक कि यश का भी उनके जीवन में कोई आकर्षण नहीं था। वे दिन-रात परमार्थ-चिन्तन में लीन रहते।
वे केवल विद्वता नहीं, बल्कि शील और सदाचार को भी अनिवार्य मानते थे। उनका कहना था —
“विद्या महान शक्ति है, परन्तु केवल विद्या से क्या होगा?
गिद्ध ऊँचा उड़ता है, पर उसकी दृष्टि सदा मुर्दे पर रहती है।”
अर्थात् बाह्य ज्ञान यदि आचरण और नैतिकता से शून्य हो, तो वह अधूरा है।
🪔 संसार में रहकर साधना का मार्ग
रामकृष्ण का उपदेश अत्यंत सरल और व्यवहारिक था। वे कहते थे —
“कटहल छूने से पहले उँगली में तेल लगा लिया करो।”
अर्थात् संसार में रहते हुए भी मन को आसक्ति से बचाना चाहिए।
वे समझाते थे —
“मन दूध है और दुनिया पानी। पहले दूध को जमा लो, उसका मंथन करो; जो मक्खन निकलेगा, वह पानी में नहीं घुलेगा।”
यह उपमा बताती है कि साधना से परिपक्व मन संसार में रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता।
💰 जीवन का उद्देश्य क्या?
धन के विषय में उनका स्पष्ट मत था —
धन से भोजन, वस्त्र और मकान तो मिल सकते हैं, परन्तु आत्मिक शान्ति, प्रेम और ईश्वरानुभूति नहीं। अतः जीवन का अंतिम उद्देश्य धन नहीं हो सकता।
🌍 विश्वव्यापी प्रभाव
माँ काली के उपासक रामकृष्ण का नाम उनके जीवनकाल में ही दूर-दूर तक फैल चुका था। किन्तु उनके महाप्रयाण के पश्चात् उनके शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने उनके संदेश को विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाया।
आज भी उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि धर्म ग्रन्थों में नहीं, बल्कि जीवंत आचरण में प्रकट होता है।
📖 स्रोत
रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय से संपादित अंश।
🙏 मानवीय मूल्यों के पोषक, महान साधक एवं स्वामी विवेकानन्द के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन।
— नवीन चन्द्र प्रसाद
Author: SPP BHARAT NEWS



