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होली-वैदिक अनुष्ठान: हास-परिहास, व्यंग्य-विनोद और सामाजिक मेल-जोल का प्रतीक

होली-वैदिक अनुष्ठान: हास-परिहास, व्यंग्य-विनोद और सामाजिक मेल-जोल का प्रतीक

होली अथवा होलिका वास्तव में एक वैदिक यज्ञ है, जिसका मूल स्वरूप आज विस्मृत हो गया है। होली के आयोजन के समय हुढ़दंग का स्वरूप समझने के लिए आइए हम वैदिक अनुष्ठान जो कि इस महापर्व के मूल में निहित है, उसे जानें।

वैदिक यज्ञों में सोमयज्ञ सर्वोपरि है। इसके तीन प्रमुख भेद थे – एकाह, अहीन और सत्रयाग। गवामयन भी इसी प्रकार का सत्रयाग था। सत्रयाग का अनुष्ठान ३६० दिनों में संपन्न होता था तथा उसमें ऋत्विग्गण ही भाग लेते थे। इसका उपान्तय (अंतिम दिन से पूर्व) का दिन ‘महव्रत’ कहलाता था।

‘महाव्रत’ के अनुष्ठान के दिन वर्षभर यज्ञानुष्ठान में व्यस्त श्रान्त-क्लान्त ऋत्विग्गण अपना मनोविनोद करते थे। इस दिन यज्ञोनुष्ठान के साथ आमोद-प्रमोदपूर्ण कृत्य भी किये जाते थे, जिसका प्रयोजन उल्लासमय वातावरण करना होता था। होलिकोत्सव इसी ‘महव्रत’ की परम्परा का संवाहक है।

होली में जालाई जाने वाली आग यज्ञवेदी में निहित अग्नि का प्रतीक है। आरंभ में उत्सवों और पर्वों का आरंभ लघु बिन्दु से होता है, जिसमें निरंतर विकास होता जाता है। सामाजिक आवश्यकताएँ इनके विकास में विशेष भूमिका निभाती हैं।

यही कारण है कि होली जो मूलतः एक वैदिक सोमयज्ञ के अनुष्ठान से आरम्भ हुआ, आगे चल कर परम भागवत प्रहलाद और उनकी बुआ होलिका के आख्यान से भी जुड़ गया। गवामयन के अंतर्गत महव्रत के इस परिवर्धित और उपबृंहित पर्व-संस्कार में ‘नव-शस्येष्टि’ (नयी फसल के अनाज का सेवन करने के लिए किया गया अनुष्ठान) तथा आगे चलकर वसंतोत्सव का समावेश भी इसी क्रम में शुरू हो गया।

मानव जीवन में धर्म, अर्थ और मोक्ष के साथ काम भी एक पुरुषार्थ के रूप में प्रतिष्ठित है। होलिकोत्सव के रूप में हिन्दू-समाज ने मनोरंजन को जीवन में स्थान देने के लिए तृतीय पुरुषार्थ के स्वस्थ और लोकोपयोगी स्वरूप को धर्माधिष्ठित मान्यता प्रदान की है।

इस प्रकार होली मूलतः धार्मिक अनुष्ठान है, अतः इसे सामाजिक मेलजोल, भाईचारे व मर्यादित हर्षोल्लास से मानना चाहिए। होली का त्योहार हमें सामाजिक समरसता और भाईचारे की भावना को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। आइए हम इस त्योहार को इसके मूल स्वरूप में मनाएं और सामाजिक मेलजोल को बढ़ावा दें।

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Author: SPP BHARAT NEWS

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