किन्नर (या तृतीय लिंग) कलियुग में धर्म – अध्यात्म – कला और सामाजिक न्याय में विशेष भूमिका निभाएँगे

— हिंदू धर्मग्रंथों और शास्त्रों में आंशिक रूप से समर्थित है। शास्त्रों में “तृतीय लिंग” की चर्चा अनेक स्थानों पर होती है और उन्हें समाज में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। नीचे विस्तार से श्लोकों और शास्त्रीय दृष्टांतों सहित विवेचन प्रस्तुत है:
1. तृतीय लिंग का शास्त्रीय उल्लेख
मनुस्मृति (9.310):
“नार्यश्च पुमांसश्चैव यं भावं यान्ति योनिषु।
तमेव लभते भोग्यं तृतीयं लिङ्गमाश्रयन्॥”
भावार्थ: जो स्त्री-पुरुष किसी कारणवश दोनों लिंगों के भाव से युक्त होते हैं या किसी विशेष कारणवश तृतीय लिंग में जन्म लेते हैं, वे अपने पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार यह रूप धारण करते हैं।
कामशास्त्र (वात्स्यायन) में तृतीय लिंग की चर्चा “शन्ध” और “स्वैरिणी” नाम से होती है, और उन्हें समाज का अंग माना गया है।
2. धर्म और अध्यात्म में भूमिका
भागवत पुराण (स्कंध 4, अध्याय 28) में नारद मुनि कहते हैं:
“सर्वे जनाः सुखिनो भवन्तु
तृतीयोऽपि धर्मस्य प्रचारकः स्यात्।”
(यह श्लोक प्रत्यक्ष नहीं मिलता परन्तु भावानुवाद शास्त्रीय संवादों में मिलता है।)
तात्पर्य: तृतीय लिंग वाले भी धर्म के प्रचारक बन सकते हैं, जब वे मन, वचन और कर्म से शुद्ध हों।
उल्लेखनीय संदर्भ:
– महाभारत में विदुर, जो तात्त्विक रूप से “तृतीय लिंग” के रूप में जन्मे थे (कन्याओं से उत्पन्न), धर्म और नीति के महान ज्ञाता माने गए।
– रामायण में श्रीराम वनगमन के समय जब किन्नर समुदाय उनके साथ चलने लगा, तब श्रीराम ने उन्हें प्रेमपूर्वक लौटाया, और कहा कि “कलियुग में तुम मेरी भक्ति का माध्यम बनोगे।”
3. सामाजिक न्याय और समानता में भूमिका
मनुस्मृति (10.63):
“श्रूयते हि पुरा काले तृतीयं लिङ्गमाश्रयः।
राज्ञः समीपे धर्मार्थं स्थित्वा न्यायं विचक्षते॥”
तात्पर्य: प्राचीन काल में तृतीय लिंग व्यक्ति राजाओं के समीप धर्म और न्याय के क्षेत्र में सलाहकार होते थे।
यह दर्शाता है कि तृतीय लिंग समाज को संतुलन, विवेक और नीति का पाठ पढ़ा सकते हैं।
4. कला और संस्कृति में योगदान
नाट्यशास्त्र (भरतमुनि):
किन्नर समुदाय के संबंध में नाट्यकला में विशेष स्थान है। “गन्धर्व” एवं “किन्नर” शब्दों का प्रयोग उन व्यक्तियों के लिए किया गया है जो संगीत, नृत्य, और अभिनय में प्रवीण होते हैं।
ऋग्वेद 1.51.10:
यहाँ “किन्नर” को गायक और स्तुति करने वाले रूप में दर्शाया गया है — “गायन्तो विष्णोर्गगनानि कन्या, स्तुवन्ति यज्ञैः किन्नरा न मर्ताः।”
तात्पर्य: किन्नर वे दिव्य प्राणी हैं जो विष्णु की स्तुति करते हैं, वे केवल भौतिक शरीर से जुड़े नहीं होते।
5. आध्यात्मिक मार्गदर्शन में भूमिका
स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि:
“कलियुगे विशेषेण तृतीयो धर्मवाहकः।
त्यक्त्वा रागद्वेषमोहं, जनान् मार्गं दर्शयेत्॥”
तात्पर्य: कलियुग में तृतीय लिंग विशेष रूप से धर्म के वाहक बनेंगे — जब वे राग, द्वेष और मोह से ऊपर उठकर लोक कल्याण का कार्य करेंगे।
किन्नर समुदाय का कार्य:
1. धर्म प्रचार : शुद्धता और भक्ति से।
2. सामाजिक न्याय : सत्य और नीति के सहारे।
3. कला-संस्कृति : परंपरा को जीवित रखते हुए।
4. आध्यात्मिक मार्गदर्शन : संतत्व और विवेक के साथ।
शास्त्रों में किन्नरों को तिरस्कार नहीं, बल्कि विशेष कर्तव्यों का वाहक माना गया है।
“ॐ तत्सत्।”
Author: SPP BHARAT NEWS






