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जनप्रतिनिधि या सिंहासन के संरक्षक: लोकतंत्र की आत्मा पर प्रश्नचिन्ह

जनप्रतिनिधि या सिंहासन के संरक्षक: लोकतंत्र की आत्मा पर प्रश्नचिन्ह

भारतीय लोकतंत्र का मूल तत्व है — जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता की सरकार। लेकिन वर्तमान समय में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली धीरे-धीरे ऐसे रूप में परिवर्तित होती दिख रही है, जहां चुने हुए प्रतिनिधि जनता के नहीं, बल्कि सत्ता और पद की प्रतिष्ठा के संरक्षक बन गए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली, जो अक्सर पौराणिक रूपकों, भावनात्मक प्रतीकों और ऐतिहासिक आभामंडल से सजी होती है, इस प्रवृत्ति की एक जीवंत मिसाल बन गई है। संसद में राजदण्ड की स्थापना, नए संसद भवन का भव्य अनावरण, या स्वयं को आधुनिक विक्रमादित्य के रूप में देखने की आकांक्षा — ये सब प्रतीकात्मक घटनाएं आज के लोकतांत्रिक यथार्थ से विमुख प्रतीत होती हैं। ये न तो शासन को अधिक जवाबदेह बनाती हैं और न ही जनजीवन को सुगम।

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि सेवक होते हैं, शासक नहीं। लेकिन जब वे अभेद्य सुरक्षा घेरे, लाल बत्ती संस्कृति, और तामझाम से घिरे रहते हैं, तो वे अपने जन-आधार से कटने लगते हैं। यह केवल सामाजिक दूरी नहीं होती, यह आत्मिक दूरी होती है — उस विश्वास की दरार, जिससे लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होती हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांक्षा कि पूरा देश भाजपामय हो जाए, संघीय ढांचे की आत्मा के विरुद्ध जाती है। राज्यों के अधिकारों को कम करने, राज्यपालों के माध्यम से निर्वाचित सरकारों को बाधित करने और संवैधानिक संस्थाओं को एक-दूसरे से टकराव की स्थिति में लाने के उदाहरण न केवल चिंताजनक हैं, बल्कि संविधान के मूल ढांचे पर आघात भी हैं।

सांस्कृतिक गौरव की पुनर्स्थापना की बात करते हुए सरकार जब बाजारवाद के आगे आत्मसमर्पण कर देती है, तो यह केवल एक विडंबना नहीं, एक मूल्यगत पराजय बन जाती है। भारत की संस्कृति सादगी, संयम और मर्यादा में निहित है — न कि वैभव, प्रदर्शन और अति-व्यक्तिनिष्ठ प्रचार में। यदि प्रधानमंत्री स्वयं इन मूल्यों का पालन नहीं करते, तो वे दूसरों से इसकी अपेक्षा भी नहीं कर सकते।

यह भी उल्लेखनीय है कि क्रिकेट, फिल्मों और विवाह संस्कृतियों में जो विकृतियाँ आई हैं — जैसे चीयर्स गर्ल्स से लेकर अश्लीलता तक — उन्हें नियंत्रित करने की दिशा में नीतिगत पहल का अभाव सरकार की सांस्कृतिक प्रतिबद्धता पर प्रश्न खड़े करता है।

लोकतंत्र तभी तक लोकतंत्र है, जब तक जनता के पास विकल्प चुनने की स्वतंत्रता और सम्मान बना रहे। यदि कोई सरकार ऐसी रणनीतियों का प्रयोग करे जिससे मतदाता यह समझे कि “यदि किसी अन्य को चुनेंगे, तो काम नहीं होने दिया जाएगा”, तो वह वोट नहीं, भय से प्राप्त जनादेश बन जाता है — जैसा कि दिल्ली, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में देखा जा रहा है।

आज आवश्यकता है, कि हम प्रतीकों की राजनीति से आगे बढ़कर प्रभाव की राजनीति पर चर्चा करें। नायकत्व का मूल्य उसकी जनसेवा में है, न कि उसके महलों और मंचों में। भारत को चक्रवर्ती सम्राट नहीं, उत्तरदायी सेवकों की ज़रूरत है। और जब तक जनप्रतिनिधि स्वयं को शासक की तरह प्रस्तुत करते रहेंगे, तब तक लोकतंत्र केवल आभासी उत्सव बना रहेगा — आत्मा विहीन, संवेदना रहित।

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Author: SPP BHARAT NEWS

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