रसात्मक गाथा : पुस्तक मेले के मंच पर कथक की अनन्त साधना
लखनऊ की शास्त्रीय परंपराओं के अमर प्रवाह में उस दिन एक नवीन सोपान जुड़ गया जब बाइसवें राष्ट्रीय पुस्तक मेले के सांस्कृतिक- साहित्यिक मंच पर रतन सिस्टर्स—कथकांगना इशा रतन एवं मीशा रतन—अपनी शिष्या-युगल रिद्धिमा और अनुष्का के संग अवतरित हुईं। मानो संपूर्ण वातावरण घुँघरुओं की मधुर झंकार और पद-संचालन की मृदु थाप से विभोर हो उठा हो।
स्वर्गीय पं. अर्जुन मिश्र की परंपरा और वर्तमान की आचार्या सुरभि सिंह की शिक्षण-गंगा से सिंचित इन बहनों ने मंच पर उतरते ही दर्शकों को स्मरण करा दिया कि कथक केवल नृत्य नहीं, बल्कि कथा कहने की शास्त्रीय साधना है—“कथा कहे सो कथक कहावे” की परंपरा का जीता-जागता रूप।
# मंगलारम्भ और दिव्य वंदनाएँ
आरंभ हुआ गणेश वंदना से। गुरु-वाक्य के आशीष से मंडित शिष्या रिद्धिमा ने अपने पैरों की थाप से मंगलमय ताल रचते हुए विघ्नहर्ता गणपति को नृत्य में आह्वान किया। ताल और गतियों की शुद्धता ने मानो क्षणभर में दर्शकों को आराधना के भाव में बाँध लिया।
इसके अनंतर बहनों ने सम्मिलित होकर युगल शिव वंदना प्रस्तुत की। उनके नयन, हस्त-मुद्राएँ और ललित गतियाँ एकाकार होकर भोलेनाथ की लीला का मूर्त रूप बन गईं। अंग-संचालन की कोमल लचक और भाव-संवेदन की गरिमा से पूरा सभागार देवत्वमय हो उठा।
# भावों का अमृत और लोक-आस्था का संचार
अगली प्रस्तुति में शिष्या अनुष्का ने पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज की कालजयी रचना “काहे छेड़-छेड़ मोहे गरवा लगाए” को भाव और राग-ताल के संग गूँथकर प्रस्तुत किया। यह वही रचना है जिसे रूपहले पर्दे पर अमरता मिली, किंतु अनुष्का के भाव-संचालन ने उसमें भक्ति और माधुर्य का नया रंग भर दिया।
# भक्ति आंदोलन की छाया और अमीर खुसरो का काव्य
इतिहास की परतों को खोलता हुआ मंच तब भक्ति-युग की स्मृतियों में डूब गया जब रतन सिस्टर्स ने अमीर खुसरो की रचना “छाप तिलक सब भूली तोसे नैना मिलाए” पर युगल प्रस्तुति दी। किंवदंती है कि खुसरो जब वृंदावन पहुँचे और बाँके बिहारी के दर्शन किए तो कृष्ण की छवि में ऐसे रमे कि स्वयं को गोपी मान बैठे और यह अमर गीत रच डाला। मंच पर जब दोनों बहनों ने इस रचना को नृत्य-भाव में उकेरा तो दर्शक लोक-आस्था और शृंगार-रस की अनूठी लहर में बहते चले गए।
# साधना का सन्देश
समापन पर इशा रतन की वाणी गूँजी—
“हमारा नृत्य किसी मंचीय लालसा का परिणाम नहीं है, यह हमारी साधना है। तन, मन और कर्म से आत्मसात की हुई यह साधना ही वह दीप है, जिसे हम अपनी अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित कर रहे हैं।”
“ईशा और मीशा”, तुम्हारे पग-संचार में भक्ति की धारा बहे, तुम्हारे नयन-भावों में कला का अमृत झरे और तुम्हारे जीवन की गाथा युगों तक गुरु-शिष्य परंपरा को आलोकित करे। ईश्वर तुम्हारे प्रत्येक घुँघरू की झंकार में मंगल स्वर भरे और तुम्हारे पथ पर साधना का सूरज कभी न अस्त हो।
Author: SPP BHARAT NEWS






