राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष : राष्ट्र निर्माण का ऐतिहासिक पड़ाव
संघ की स्थापना और शताब्दी का महत्व
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) इस वर्ष अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है। संघ की स्थापना 27 सितंबर, 1925 को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी।
यह शताब्दी वर्ष केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण, समाज के प्रति आभार और राष्ट्र के पुनः समर्पण का अवसर माना जा रहा है।
संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत और सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के नेतृत्व में देशभर में व्यापक कार्यक्रम, संवाद और सामाजिक समरसता के आयोजन की योजनाएँ बनाई गई हैं।
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शताब्दी वर्ष का उद्देश्य
संगठन के कार्यों का विस्तार और समेकन
सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना
राष्ट्रीय पुनर्जागरण की दिशा में नई पहल
समाज के सभी वर्गों तक पहुँच और संवाद
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संघ का पक्ष और विचारधारा
1. धर्म आधारित आरक्षण पर मत
सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण असंवैधानिक है। संविधान निर्माताओं का उद्देश्य सामाजिक न्याय था, न कि धार्मिक विभाजन।
2. औरंगजेब पर दृष्टिकोण
उन्होंने स्पष्ट किया कि औरंगजेब जैसे शासक का विरोध धार्मिक आधार पर नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता और हितों की रक्षा के लिए है।
3. मानसिक उपनिवेशवाद (Mental Colonisation)
संघ का मानना है कि 1947 में भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त की, लेकिन आज भी मानसिक उपनिवेशवाद से मुक्ति जरूरी है। इसके लिए मन का उपनिवेश-मुक्तिकरण (Decolonization of Mind) आवश्यक है।
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शताब्दी वर्ष का व्यापक संदेश
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह शताब्दी वर्ष केवल भूतकाल का उत्सव नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का अवसर है।
संघ समाज के हर वर्ग तक पहुँचना चाहता है।
राष्ट्रीय चर्चा और विमर्श को प्रभावित करने की कोशिश है।
राष्ट्र निर्माण में संघ की भूमिका को पुनः परिभाषित करने का संकल्प है।
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निष्कर्ष
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष भारतीय समाज के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। यह वर्ष संघ की संगठन शक्ति, सामाजिक योगदान और भविष्य की योजनाओं का प्रतीक बनेगा।
???? “शताब्दी वर्ष” में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के असंख्य स्वयंसेवकों को हार्दिक शुभकामनाएँ।
Author: SPP BHARAT NEWS






