स्वामी विवेकानन्द : सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के पिता
जब स्वामी विवेकानन्द का आविर्भाव हुआ, तब उनके समक्ष अनेक ऐतिहासिक दायित्व उपस्थित थे। उनमें सबसे प्रमुख था—धर्म की पुनः प्रतिष्ठा। उस समय केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर में बुद्धिवादी मानव की धर्म के प्रति श्रद्धा डगमगाने लगी थी। ऐसे में आवश्यकता थी एक ऐसी नवीन और वैज्ञानिक व्याख्या की, जो आधुनिक मनुष्य को स्वीकार्य हो तथा उसकी इहलौकिक प्रगति में बाधक न बने।
दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य था—हिन्दू धर्म के प्रति स्वयं हिन्दुओं की श्रद्धा को पुनः जाग्रत करना। यूरोपीय प्रभाव में आए भारतीय तब तक अपने धर्म, संस्कृति और इतिहास को मानने को तैयार नहीं थे, जब तक कि पश्चिमी जगत उसकी प्रशंसा न करे। तीसरा और सर्वाधिक व्यापक लक्ष्य था—भारतीयों में आत्मगौरव और आत्मविश्वास का संचार, ताकि वे स्वयं को अपनी महान संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिक परंपराओं के योग्य उत्तराधिकारी के रूप में पहचान सकें।
केवल 39 वर्ष की अल्पायु में स्वामी विवेकानन्द का देहावसान हो गया, किंतु इस सीमित कालखंड में ही उन्होंने इन तीनों महान उद्देश्यों की सिद्धि कर दी। राजा राममोहन राय के समय से भारतीय समाज और संस्कृति में जो नवजागरण का प्रवाह चल रहा था, वह स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व में आकर अपनी चरम अवस्था को प्राप्त हुआ
विवेकानन्द वह सेतु हैं, जिस पर प्राचीन और नवीन भारत एक-दूसरे का आलिंगन करते हैं। वे वह महासागर हैं, जिसमें धर्म और राजनीति, राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता, उपनिषद और विज्ञान—सभी समाहित हैं। महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ठीक ही कहा था—
“यदि कोई भारत को समझना चाहता है, तो उसे विवेकानन्द को पढ़ना चाहिए।”
स्वामी विवेकानन्द मूलतः धर्म और संस्कृति के महान नेता थे। राजनीति से उनका प्रत्यक्ष सरोकार नहीं था, किंतु यह भी सत्य है कि राजनीति स्वयं संस्कृति की अनुचरी मात्र होती है। स्वामी जी ने अपनी ओजस्वी वाणी और कर्मयोग से भारतवासियों में यह गर्व जगाया कि—
हम विश्व की अत्यंत प्राचीन सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं,
हमारे धार्मिक ग्रंथ विश्व में सर्वोत्तम हैं,
हमारा इतिहास गौरवशाली है,
संस्कृत विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध भाषा है,
और हमारा धर्म ऐसा है जो विज्ञान की कसौटी पर भी खरा उतरता है।
स्वामी विवेकानन्द की वाणी से यह दृढ़ विश्वास उत्पन्न हुआ कि भारत को किसी के समक्ष सिर झुकाने या लज्जित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। भारत में पहले सांस्कृतिक राष्ट्रीयता का जन्म हुआ और उसके बाद राजनीतिक राष्ट्रीयता का, और इस सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के निर्विवाद रूप से पिता स्वामी विवेकानन्द ही थे।
स्रोत : रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कृत “संस्कृति के चार अध्याय” से संपादित अंश
स्वामी विवेकानन्द जी की जयंती पर उन्हें कोटिशः नमन।
— नवीन चन्द्र प्रसाद
Author: SPP BHARAT NEWS





