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मकर संक्रांति : अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला महापर्व

मकर संक्रांति : अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला महापर्व

मकर संक्रांति भारत का एक राष्ट्रीय एवं सनातन सांस्कृतिक पर्व है, जो संपूर्ण देश को एकता के सूत्र में बांधने वाला उत्सव है। यह पर्व केवल तिथि विशेष नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान, अंधकार से प्रकाश और निराशा से आशा की ओर अग्रसर होने का प्रतीक महापर्व है। प्रत्येक सनातन धर्मावलंबी इस पर्व को श्रद्धा, आस्था और उल्लास के साथ मनाता है।
सूर्य का उत्तरायण और देवताओं का प्रभात काल
जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब वह दिन मकर संक्रांति कहलाता है। इसी दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है। शास्त्रों में उत्तरायण काल को देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। इस प्रकार मकर संक्रांति को देवताओं का प्रभात काल भी माना जाता है।
संत तुलसीदास जी ने इस पावन समय का उल्लेख करते हुए लिखा है—
“माघ मकरगत रबि जब होई,
तीरथ पतिहिं आव सब कोई।”
अर्थात् माघ मास में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही सभी श्रद्धालु तीर्थराजों की ओर स्नान-दान हेतु प्रस्थान करते हैं।
स्नान, दान और पुण्य का विशेष महत्व
मकर संक्रांति के दिन स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध एवं अनुष्ठान का विशेष महत्व है। इस दिन गंगा स्नान और वहीं दान करने को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
तीर्थराज प्रयाग और गंगासागर में मकर संक्रांति स्नान विश्वविख्यात है, जहाँ लाखों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं।
विविधता में एकता : देशभर में अलग-अलग रूप
मकर संक्रांति भारत की सांस्कृतिक विविधता का जीवंत उदाहरण है। देश के विभिन्न भागों में यह पर्व अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है—
उत्तर प्रदेश : खिचड़ी पर्व
महाराष्ट्र : पहली संक्रांति
पश्चिम बंगाल : संक्रांति
दक्षिण भारत : पोंगल
पंजाब व कश्मीर : लोहड़ी
असम : बिहू
झारखंड (पंचपरगना क्षेत्र) : टूसू पर्व
बिहार (मदार क्षेत्र) : मेला आयोजन
गुजरात : पतंग उड़ाने की प्रतियोगिताएं
केरल : नौकायन उत्सव
राजस्थान में महिलाएं तिल के लड्डू, घेवर और मोतीचूर के लड्डू पर रुपया रखकर अपनी सास को भेंट करती हैं, जो पारिवारिक स्नेह और परंपरा का सुंदर उदाहरण है।
वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक महत्व
मकर संक्रांति के अवसर पर दही-चूड़ा, तिल और गुड़ से बने व्यंजन खाने की परंपरा है। इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक आधार है।
तिल शरीर में ऊर्जा का संचार करता है, जबकि गुड़ सर्दी में जमे कफ को बाहर निकालने में सहायक होता है। इसी कारण कहा जाता है कि मकर संक्रांति रोग से निरोगी बनने की दिशा में अग्रसर करने वाला पर्व है।
यह पर्व बसंत ऋतु के आगमन का भी संकेत देता है, जो नवजीवन, उत्साह और सकारात्मकता का प्रतीक है।
समापन
मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति, आस्था और विज्ञान का अद्भुत संगम है। यह पर्व हमें प्रकृति, समाज और जीवन के प्रति संतुलन और सद्भाव का संदेश देता है।
मकर संक्रांति के पावन महापर्व की सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं।
— नवीन चन्द्र प्रसाद
SPP BHARAT NEWS
Author: SPP BHARAT NEWS

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