माटी का राग, सावन की फुहार: जब मस्तेमऊ स्कूल के प्रांगण में पौधों के रोपण संग गूंजे अवधी लोकगीत
रिपोर्ट : प्रदिप शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
लखनऊ | 11 जुलाई 2026
वेब डेस्क (लोकरंग विशेष)
📍 स्थान: राजकीय हाईस्कूल मस्तेमऊ, गोसाईगंज, लखनऊ
🌱 आयोजन: ‘लोकरंग फाउंडेशन’ द्वारा दो दिवसीय विशेष कार्यशाला
राजधानी के गोसाईगंज स्थित राजकीय हाईस्कूल मस्तेमऊ के प्रांगण में बीते दिनों एक अनूठा समागम देखने को मिला, जहाँ प्रकृति और संस्कृति की जुगलबंदी ने एक समृद्ध विमर्श को जन्म दिया। ‘लोकरंग फाउंडेशन’ द्वारा आयोजित दो दिवसीय विशेष कार्यशाला के माध्यम से न केवल धरा को हरा-भरा करने का संकल्प लिया गया, बल्कि नई पीढ़ी को हमारी लुप्त होती भाषाई और साहित्यिक धरोहर से भी जोड़ा गया। यह आयोजन वर्तमान समय में वर्षा ऋतु के पर्यावरणीय, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करने वाला एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरा है।
📊 एक नज़र में: कार्यशाला की मुख्य बातें
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मुख्य बिंदु |
विवरण |
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आयोजक |
लोकरंग फाउंडेशन |
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सहयोग |
राजकीय हाईस्कूल मस्तेमऊ की प्रधानाचार्या, शिक्षक एवं विद्यार्थी |
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मुख्य अभियान |
वृहद पौधरोपण (लगभग 40 पारंपरिक एवं औषधीय पौधे) |
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सांस्कृतिक सत्र |
अवधी लोकगीत, बरखा गीत, कजरी और संगीत की बुनियादी शिक्षा |
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मुख्य संदेश |
पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोक कलाओं का शिक्षा में एकीकरण (NEP के तहत) |
🌱 पर्यावरणीय चेतना: धरा का श्रृंगार और पौधरोपण का अनुष्ठान
मानव जीवन और प्रकृति के अंतर्संबंधों में वर्षा ऋतु (पावस काल) का स्थान सर्वोपरि है। ग्रीष्म की तपन से झुलसी धरती को नवजीवन देने वाली वर्षा केवल पानी की फुहारें नहीं, बल्कि जीवन का उल्लास लेकर आती है। पर्यावरणविदों के अनुसार, वर्षा ऋतु ही वह सर्वोत्तम समय है जब रोपे गए पौधों के जीवित रहने और पनपने की संभावना सबसे अधिक होती है।
इसी वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व को समझते हुए कार्यशाला का शुभारंभ एक वृहद पौधरोपण अभियान से हुआ। लोकरंग फाउंडेशन के अध्यक्ष अतुल कुमार सिंह के नेतृत्व में संस्था के पदाधिकारियों, विद्यालय की प्रधानाचार्या, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने मिलकर सामूहिक रूप से लगभग चालीस पौधों का रोपण किया।
🌳 रोपे गए पौधों की विशेषता (भारतीय पारिस्थितिकी के रक्षक):
- नीम और पीपल: जो चौबीसों घंटे ऑक्सीजन का स्तर बनाए रखने और वायु शुद्धिकरण में सहायक हैं।
- पाकड़: जो जैव विविधता और पक्षियों के आश्रय के लिए उत्तम माना जाता है।
- आम, अमरूद और जामुन: जो भविष्य में न केवल हरियाली बिखेरेंगे बल्कि फलदार वृक्षों के रूप में जैव-प्रणाली को समृद्ध करेंगे।
🎶 सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विमर्श: सावन के गीत और अवधी की मिठास
भारतीय संस्कृति में वर्षा ऋतु केवल एक मौसम नहीं, बल्कि एक संपूर्ण उत्सव है। हमारे साहित्य और लोक-जीवन में आषाढ़, सावन और भादों के महीनों पर अनगिनत रचनाएँ रची गई हैं। मल्हार, कजरी और सावन के पारंपरिक लोकगीत हमारी सांस्कृतिक चेतना के अभिन्न अंग हैं, जो दुर्भाग्य से आज के डिजिटल युग में कहीं खोते जा रहे हैं।
इसी सांस्कृतिक शून्यता को भरने के लिए कार्यशाला के दूसरे सत्र को साहित्यिक और संगीतमय रूप दिया गया। विद्यार्थियों को भारतीय संगीत के सात सुरों, शास्त्रीय गायकी की बारीकियों और लोक विधाओं से परिचित कराया गया।
🎤 अवधी माटी की महक:
गायन गुरु बरखा श्रीवास्तव ने जब अवधी भाषा की मिठास को सुरों में पिरोया, तो पूरा परिसर मानों झूम उठा। उन्होंने छात्राओं को पारंपरिक गीतों का सस्वर अभ्यास कराया:
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- बरखा गीत: “बरसन लागी बदरिया रुम-झूम के”
- सावन गीत: “सावन मा हिया हरसाया हो हरी मेंहदी ले आया”
इन गीतों के माध्यम से बच्चों ने न केवल सुर साधना सीखी, बल्कि अपनी क्षेत्रीय भाषा अवधी के साहित्यिक सौंदर्य और बिम्बों को भी समझा।
📚 शैक्षणिक महत्व: किताबों से इतर जीवन मूल्यों की शिक्षा
आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में जहाँ अक्सर किताबी ज्ञान पर जोर दिया जाता है, वहीं इस तरह के आयोजन विद्यार्थियों के भीतर सामाजिक उत्तरदायित्व और कलात्मक अभिरुचि जगाने का काम करते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) भी पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोक कलाओं के एकीकरण पर बल देती है।
जब बच्चों ने अपनी गुरु के सुर में सुर मिलाकर अवधी देशगीत गाया, तो उनके भीतर राष्ट्रप्रेम और अपनी जड़ों के प्रति गौरव का भाव स्पष्ट दिखाई दिया। केवल बच्चे ही नहीं, बल्कि विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं ने भी इस सांस्कृतिक धरोहर का भरपूर आनंद लिया।
💬 प्रधानाचार्या का संदेश
आयोजन के समापन पर विद्यालय की प्रधानाचार्या कुसुम वर्मा ने लोकरंग फाउंडेशन की इस अनूठी पहल की सराहना करते हुए आभार व्यक्त किया:
”ऐसे आयोजन बच्चों के समग्र विकास (Holistic Development) के लिए आवश्यक हैं। यह प्रयास उन्हें पर्यावरण के प्रति संवेदनशील और अपनी संस्कृति के प्रति सजग नागरिक बनाते हैं।”
संपादकीय टिप्पणी:
”जड़ों को सहेजने की इस मुहिम में, जहाँ मिट्टी को पौधों का साथ मिला, वहीं नई पीढ़ी के कंठ को अपनी ही माटी का राग मिला।”
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Author: SPP BHARAT NEWS



